“The Secret of Seeing and Hearing Hearts”
“देखने और सुनने वाले हृदय का रहस्य” Matthew 13:12-17
📖 पद 12 — “क्योंकि जिसके पास है, उसे और दिया जाएगा…”
(Verse 12 — “For whoever has, to him more will be given…”)
🔍 Explanation / व्याख्या:
यीशु यहाँ एक आध्यात्मिक सिद्धांत (spiritual law) बता रहे हैं —
परमेश्वर के राज्य में जो व्यक्ति सत्य को ग्रहण करता है और उस पर चलता है, उसे परमेश्वर और गहराई से सिखाता है।
लेकिन जो उदासीन या आलसी है, वह धीरे-धीरे अपनी आत्मिक समझ खो देता है।
This is not about possessions, but about perception.
It’s a law of spiritual growth: Use it, or lose it.
🌱 Truth multiplies in a humble heart, but dies in a proud one.
💬 Application / जीवन में लागू करें:
हर बार जब हम परमेश्वर के वचन को सुनते हैं, हमें यह तय करना होता है —
क्या मैं इसे केवल सुनूंगा, या इसका पालन करूंगा?
हर आज्ञाकारिता नई प्रकाशना (new revelation) का द्वार खोलती है।
📖 पद 13 — “मैं उनसे दृष्टान्तों में इसलिये बातें करता हूँ…”
(Verse 13 — “This is why I speak to them in parables…”)
🔍 Explanation / व्याख्या:
यीशु के दृष्टान्त सिर्फ कहानियाँ नहीं थे; वे राज्य के रहस्य छिपाए हुए खज़ाने थे।
जो वास्तव में जानना चाहता था, वह खोजता और समझता;
पर जो केवल सतही श्रोता थे, वे अर्थ तक नहीं पहुँच पाते।
Jesus used parables to filter the hearts —
not to hide truth from the sincere, but to conceal it from the careless.
💭 The parable reveals truth to the hungry, but hides it from the proud.
💬 Application / जीवन में लागू करें:
आज भी वचन वैसा ही कार्य करता है।
जब हम बाइबल पढ़ते हैं, तो कुछ लोग केवल “कहानी” देखते हैं,
पर जो आत्मिक रूप से भूखे हैं, वे उसमें से राज्य की चाबी खोज लेते हैं।
📖 पद 14–15 — “तुम सुनोगे तो सही, परन्तु न समझोगे…”
(Verses 14–15 — Isaiah’s prophecy fulfilled)
🔍 Explanation / व्याख्या:
यीशु ने यशायाह की भविष्यवाणी उद्धृत की, जो एक आत्मिक बीमारी को दर्शाती है —
“सुस्त हृदय” (dull heart)।
ऐसा हृदय न देखना चाहता है, न सुनना, न समझना।
यह आत्मिक कठोरता का परिणाम है — जब मनुष्य बार-बार सत्य को सुनता है, पर कभी प्रतिक्रिया नहीं देता।
🧱 Every time we ignore truth, another layer of hardness forms over the heart.
💬 Application / जीवन में लागू करें:
यदि हम बार-बार परमेश्वर के वचन को सुनते हैं पर परिवर्तन नहीं लाते,
तो धीरे-धीरे वचन का प्रभाव हमारे अंदर कम हो जाता है।
इसीलिए आज परमेश्वर कहता है:
“यदि तुम उसकी आवाज़ आज सुनो, तो अपने हृदय को कठोर न करो।” — भजन 95:7–8
📖 पद 16 — “परन्तु धन्य हैं तुम्हारी आँखें…”
(Verse 16 — “But blessed are your eyes, for they see…”)
🔍 Explanation / व्याख्या:
यहाँ यीशु अपने चेलों को विशेष सम्मान देते हैं —
वे केवल सुनने वाले नहीं, बल्कि देखने वाले गवाह (witnesses) हैं।
वे स्वयं मसीह के कार्यों और शिक्षा का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं।
Today, every believer who walks with Jesus is equally blessed.
We see with the eyes of faith what others could only imagine.
🌤️ To see Jesus is the greatest blessing a soul can receive.
💬 Application / जीवन में लागू करें:
हम बाइबल के हर पृष्ठ में यीशु को देख सकते हैं,
हर प्रार्थना में उसकी आवाज़ सुन सकते हैं।
धन्य हैं वे जो केवल कान से नहीं, हृदय से सुनते हैं।
📖 पद 17 — “बहुत से भविष्यवक्ताओं और धर्मियों ने चाहा…”
(Verse 17 — “Many prophets and righteous men desired to see what you see…”)
🔍 Explanation / व्याख्या:
भविष्यवक्ता जैसे यशायाह, दानिय्येल, दाऊद आदि ने मसीहा के आने की भविष्यवाणी की थी,
पर वे उस युग में नहीं जी सके जब वह आया।
पर चेलों को यह अवसर मिला कि वे परमेश्वर के पुत्र को स्वयं देख और सुन सकें।
🌺 What prophets longed to see, we can now experience daily through Christ.
💬 Application / जीवन में लागू करें:
हम उस आशीर्वाद के युग में हैं जहाँ मसीह हमारे भीतर वास करता है।
पवित्र आत्मा हमें वही बातें सिखाता है जो यीशु ने कही थीं।
यह परमेश्वर का अनुग्रह है — इसलिए हमें इस संबंध को गंभीरता और आदर के साथ जीना चाहिए।
🌾 सारांश / Summary
| सिद्धांत / Principle |
व्याख्या / Explanation |
| 1. जो ग्रहण करता है, वही बढ़ता है |
वचन पर चलने से नई समझ मिलती है |
| 2. दृष्टान्त दिल की परीक्षा हैं |
सच्चे खोजी ही सत्य तक पहुँचते हैं |
| 3. सुस्त हृदय आत्मिक अंधकार लाता है |
सत्य को बार-बार अनसुना करना खतरा है |
| 4. देखने-सुनने वाला हृदय धन्य है |
जो यीशु को पहचानता है, वही सच्चा धन्य है |
| 5. आज हमारे पास वही अवसर है जिसकी भविष्यवक्ताओं ने लालसा की थी |
मसीह हमारे भीतर कार्य कर रहा है |
🙏 अंतिम विचार / Final Reflection
“Lord, give me eyes to see, ears to hear, and a heart to understand.”
“हे प्रभु, मुझे देखने वाली आँखें, सुनने वाले कान और समझने वाला हृदय दे।”
हर बार जब हम वचन सुनें, तो केवल जानकारी न लें —
बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव करें, और उसी के स्वरूप में परिवर्तित हों।
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