आत्मा में स्वतंत्रता और रूपांतरण 2 कुरिन्थियों 3:17-18
"आत्मा में स्वतंत्रता और रूपांतरण" 2 कुरिन्थियों 3:17-18
परिचय:
सुप्रभात भाइयों और बहनों! आज हम परमेश्वर के वचन से एक अद्भुत पद पर ध्यान केंद्रित करेंगे, 2 कुरिन्थियों 3:17-18। इन पदों में पौलुस हमें प्रभु की आत्मा के द्वारा मिलने वाली स्वतंत्रता और उसके स्वरूप में हमारे निरंतर रूपांतरण के बारे में सिखाते हैं। आइए इस स्वतंत्रता और परिवर्तन को समझें, जो हमें परमेश्वर की उपस्थिति में जीवन व्यतीत करने से मिलता है।
वचन:
आइए हम इस पद को एक साथ पढ़ते हैं:
"अब प्रभु आत्मा है; और जहाँ कहीं प्रभु की आत्मा है, वहाँ स्वतंत्रता है। और हम सब के मुँह से पर्दा उठ गया है और हम सब प्रभु की महिमा को देखते हुए उसके स्वरूप में बदलते जाते हैं, जो महिमा दिन पर दिन बढ़ती जाती है। यह परिवर्तन प्रभु की आत्मा के द्वारा होता है।" (2 कुरिन्थियों 3:17-18)
1. आत्मा में स्वतंत्रता (पद 17)
पौलुस शुरुआत में कहते हैं, "अब प्रभु आत्मा है; और जहाँ कहीं प्रभु की आत्मा है, वहाँ स्वतंत्रता है।"
पौलुस किस प्रकार की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं? क्या यह केवल अपनी मर्जी से जीवन जीने की स्वतंत्रता है? नहीं, यह स्वतंत्रता कहीं अधिक गहरी और आध्यात्मिक है।
- विधि से स्वतंत्रता पौलुस पुराने वाचा, जिसे मूसा ने स्थापित किया था, की तुलना नए वाचा से करते हैं, जो हमें मसीह के द्वारा मिला है। पुरानी वाचा के अधीन लोग नियमों का पालन करने के लिए संघर्ष करते थे, परंतु यीशु ने आकर उन नियमों को पूरा किया और अपने बलिदान से हमें नई वाचा में प्रवेश दिलाया। आत्मा के द्वारा, हम अब विधि के गुलाम नहीं रहे, बल्कि परमेश्वर की कृपा में स्वतंत्र हैं।
- पाप और शर्म से स्वतंत्रता: यीशु के बलिदान से, पाप की बेड़ियाँ टूट गईं। हम अब दोष और निंदा से मुक्त हैं। रोमियों 8:1 में लिखा है, "अतः अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर कोई दंड की आज्ञा नहीं है।" आत्मा हमें इस स्वतंत्रता में चलने की शक्ति देता है।
- परमेश्वर के पास आने की स्वतंत्रता: पुराने वाचा में केवल महायाजक को पवित्र स्थान में जाने की अनुमति थी, और वह भी बहुत सावधानी से। परंतु अब, यीशु के कारण, हमें सीधे परमेश्वर के पास आने की अनुमति है। इब्रानियों 4:16 हमें प्रेरित करता है, "आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के पास निडरता से जाएँ।" यह वही स्वतंत्रता है, जो आत्मा हमें प्रदान करता है – बिना किसी पर्दे के, परमेश्वर के निकट आने की स्वतंत्रता।
2. परमेश्वर की महिमा का अवलोकन (पद 18)
पौलुस आगे कहते हैं, "और हम सब के मुँह से पर्दा उठ गया है और हम प्रभु की महिमा को देखते हुए..."
परमेश्वर की महिमा का अवलोकन करने का क्या अर्थ है? पौलुस यहाँ परमेश्वर की उपस्थिति में समय बिताने और उसकी महिमा को देखने की प्रक्रिया की बात कर रहे हैं।
- उत्कट आशा के साथ देखना: जब हम प्रार्थना, आराधना, और वचन पढ़ने में समय बिताते हैं, तो हम परमेश्वर की महिमा का अवलोकन करते हैं। जब हम उसकी उपस्थिति को खोजते हैं, हम केवल निष्क्रिय दर्शक नहीं होते; हम उसे गहराई से जानने के लिए सक्रिय प्रतिभागी होते हैं। जिस प्रकार दर्पण एक छवि को प्रतिबिंबित करता है, उसी प्रकार हमारी जीवन शैली भी परमेश्वर की महिमा को प्रतिबिंबित करनी चाहिए।
3. उसके स्वरूप में रूपांतरण (पद 18)
पौलुस यहाँ एक शक्तिशाली सत्य प्रकट करते हैं: "…हम उसके स्वरूप में बदलते जाते हैं जो महिमा दिन पर दिन बढ़ती जाती है, जो प्रभु की आत्मा के द्वारा होती है।"
- रूपांतरण एक प्रक्रिया है: ध्यान दें कि पौलुस कहते हैं "हम बदलते जाते हैं।" यह एक बार का घटित नहीं है, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है। हर दिन जब हम यीशु का अनुसरण करते हैं और आत्मा में चलते हैं, हम उसके जैसे बनते जाते हैं। "परिवर्तित" शब्द के लिए इस्तेमाल किया गया यूनानी शब्द "मेटामोर्फो" है, वही शब्द जो यीशु के रूपांतरण के लिए उपयोग किया गया था। यह रूपांतरण हमारे अंदर एक गहरा बदलाव है, जो बाहर से प्रकट होता है।
- उसके स्वरूप में: इस रूपांतरण का उद्देश्य मसीह के समान बनना है। परमेश्वर का उद्देश्य है कि वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढाले। रोमियों 8:29 कहता है, "जिन्हें उसने पहिले से जान लिया, उन्हें पहिले से ठहराया भी कि वे उसके पुत्र के स्वरूप में ढलें।" हमारा चरित्र, हमारे व्यवहार, हमारा प्रेम और हमारे कार्य मसीह को प्रतिबिंबित करने चाहिए।
- महिमा से महिमा में: जैसे-जैसे हम विश्वास में बढ़ते हैं, हमारे जीवन में परमेश्वर की महिमा अधिक स्पष्ट होती जाती है। यह महिमा हमारी अपनी नहीं है, बल्कि यह आत्मा से आती है जो हमारे भीतर है। जितना अधिक हम आत्मा के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, उतना ही अधिक हम परमेश्वर के चरित्र को प्रतिबिंबित करते हैं। यह जीवनभर की यात्रा है, जो हमें लगातार परमेश्वर के हृदय के करीब ले जाती है।
उपयोग:
हम इस स्वतंत्रता में कैसे जीवन व्यतीत करें और इस रूपांतरण का अनुभव कैसे करें?
1. आत्मा में चलें: हमें प्रतिदिन पवित्र आत्मा के प्रति समर्पण करना चाहिए, जिससे वह हमारे विचारों, कार्यों और इच्छाओं का मार्गदर्शन कर सके। गलातियों 5:16 कहता है, "आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की इच्छाओं को पूरा न करोगे।" जब हम आत्मा के अनुसार जीवन जीते हैं, हम सच्ची स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं।
2. परमेश्वर की उपस्थिति को खोजें: परमेश्वर की महिमा को देखने के लिए समय निकालें। चाहे वह प्रार्थना, आराधना, या वचन का अध्ययन हो, हमें अपनी आँखें यीशु पर केंद्रित करनी चाहिए। जब हम उसकी ओर देखते हैं, उसकी आत्मा हमें अंदर से बाहर तक बदल देती है।
3. प्रक्रिया को अपनाएँ: रूपांतरण समय लेता है। हमारे जीवन में संघर्ष और कठिनाइयाँ आएंगी, पर हमें यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर हमारे अंदर विश्वासपूर्वक कार्य कर रहा है। फिलिप्पियों 1:6 हमें आश्वासन देता है कि, "जिसने तुम में अच्छा काम शुरू किया, वह उसे पूरा भी करेगा।" अपने आप को धैर्यपूर्वक देखिए, यह जानते हुए कि परमेश्वर आपको अपने स्वरूप में ढाल रहा है।
निष्कर्ष:
भाइयों और बहनों, प्रभु की आत्मा हमें स्वतंत्रता देती है, और यह स्वतंत्रता हमें परमेश्वर की महिमा को बिना किसी आवरण के देखने की अनुमति देती है। जैसे-जैसे हम उसकी महिमा का अवलोकन करते हैं, हम प्रतिदिन उसके स्वरूप में बदलते जाते हैं। यह रूपांतरण एक महिमामय यात्रा है, जो हमारे जीवन में परमेश्वर की बढ़ती महिमा को दर्शाता है।
आइए हम इस स्वतंत्रता में चलें, उसकी महिमा को देखें, और उस रूपांतरण को अपनाएँ जो उसकी आत्मा से आता है। आमीन।
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